विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के पास कार्यकर्ताओं की कमी — टिकट देने के लिए सेलिब्रिटी क्यों?
खुद को “विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी” कहती है। देश के हर गांव, हर वार्ड, और हर बूथ तक संगठन का दावा करने वाली इस पार्टी की पहचान समर्पित कार्यकर्ताओं से रही है। लेकिन हाल के चुनावों में एक सवाल बार-बार उठने लगा है — जब इतनी बड़ी फौज है तो टिकट देने के लिए फिल्म स्टार, खिलाड़ी और सेलिब्रिटी की ज़रूरत क्यों पड़ रही है?
इतिहास बताता है कि यह पार्टी अपने संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं के दम पर खड़ी हुई थी। booth-level कार्यकर्ता से लेकर प्रधानमंत्री तक की सीढ़ी इसने “कार्यकर्ता संस्कृति” के नाम पर बनाई थी। लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं। हर चुनाव में टिकट पाने की दौड़ में भाजपा नेताओं से ज्यादा बाहरी चेहरे नजर आ रहे हैं। चाहे वो अभिनेता हों, खिलाड़ी हों या सोशल मीडिया पर मशहूर चेहरे — पार्टी उन्हें जनता से “सीधा कनेक्ट” बताकर मैदान में उतार रही है।
दरअसल,पार्टी का तर्क है कि आज राजनीति का स्वरूप बदल गया है। जहां पहले कार्यकर्ता संगठन की रीढ़ थे, वहीं अब चुनाव “इमेज” और “रिच” पर आधारित हो चुके हैं। सोशल मीडिया और टीवी कवरेज के दौर में स्टार चेहरे जनता को तुरंत आकर्षित करते हैं, जबकि संगठन के पुराने कार्यकर्ता इतने प्रभावशाली नहीं दिखते।
लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह “संगठन आधारित राजनीति” के मूल सिद्धांतों से दूरी नहीं है? कई वरिष्ठ कार्यकर्ता खुलकर मानते हैं कि इससे निचले स्तर पर हताशा बढ़ रही है। जिन लोगों ने दशकों तक पार्टी को मजबूत किया, वे अब खुद को दरकिनार महसूस कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह नया प्रयोग अल्पकालिक लाभ तो दे सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह उसकी संगठनात्मक नींव को कमजोर करेगा। पार्टी को तय करना होगा कि वह “जनआंदोलन” की छवि बचाए रखना चाहती है या “ब्रांड इमेज” पर टिके रहना चाहती है।
भले ही चुनाव में सेलिब्रिटी भीड़ खींच लें, लेकिन जीतने के बाद जनता के बीच वही टिकेगा जो जमीनी हकीकत और लोगों के मुद्दों से जुड़ा होगा। यही वह जगह है, जहां असली कार्यकर्ता की भूमिका सबसे अहम साबित होती है।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें