किसानों का काला दिवस: जब पुलिस ने बहू-बेटियों को बेरहमी से पीटा, घरों में मचाई तबाही
बक्सर: एक साल बीत गया, लेकिन दर्द आज भी ताजा है। 20 मार्च का दिन जब बनारपुर, कोचाढ़ी और मोहनपुरवा के किसानों और खेतिहर मजदूरों के घरों में पुलिस घुसी थी, लाठियों की बौछार हुई थी, बहू-बेटियों पर कहर टूटा था। यह वही दिन था, जब किसानों की संपत्ति नष्ट कर दी गई, अलमारियों से गहने गायब कर दिए गए, और CCTV कैमरों में कैद होने से पहले सबूत मिटा दिए गए।
आज, उसी भयावह घटना की बरसी पर किसानों ने काला दिवस मनाकर अपना गुस्सा जताया। STPL परियोजना से प्रभावित किसानों ने काली पट्टी बांधकर सड़कों पर उतरकर सरकार और प्रशासन के खिलाफ आक्रोश व्यक्त किया। चौसा से बक्सर जिला मुख्यालय तक निकाली गई आक्रोश रैली में सैकड़ों किसानों ने प्रशासन की ज्यादतियों के खिलाफ आवाज बुलंद की।
जब पुलिस ने घरों को युद्धभूमि बना दिया
20 मार्च 2024 की आतंक की रात थी। पुलिस की वर्दी में आए अफसरों और जवानों ने किसानों के घरों को युद्धक्षेत्र में तब्दील कर दिया। बच्चों की चीखें, महिलाओं की पुकार और बुजुर्गों की दहशत… लेकिन लाठियां नहीं रुकीं। घरों के दरवाजे तोड़े गए, संपत्ति तहस-नहस कर दी गई, गहने-नकदी लूट लिए गए। कई किसानों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, और जो किसान गिरफ्तार होने से बच गए उनके घरों की कुर्की कर दी गई।
आज भी हक की लड़ाई जारी
किसानों का कहना है कि प्रशासन ने STPL कंपनी से मिलीभगत कर उनके हक को कुचल दिया है। उनकी जमीनें छीन ली गईं, लेकिन वादा किए गए मुआवजे और रोजगार से उन्हें वंचित रखा गया।
किसानों की प्रमुख मांगें हैं:
हर प्रभावित किसान को 500,000 रुपये का मुआवजा
प्रभावित मजदूरों को 750 दिन की मजदूरी
जिनकी जमीन ली गई, उन्हें आवासीय भूमि दी जाए
भारतीय किसान यूनियन और संयुक्त किसान मोर्चा ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो आंदोलन और उग्र होगा।
"हम डरेंगे नहीं, अपने अधिकार लेकर रहेंगे!"
किसानों ने साफ कह दिया—अब प्रशासन की लाठी-गोली हमें नहीं डरा सकती। चाहे जितना दमन किया जाए, वे अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ते रहेंगे।
आज जब बनारपुर, कोचाढ़ी और मोहनपुरवा में माताएं अपनी बेटियों को देखकर सिहर उठती हैं, जब लाठी की मार खाए किसान अपने जख्मों को सहलाते हैं, जब उजड़े हुए घरों की दीवारें गवाही देती हैं—तब यह सवाल उठता है कि आखिर कब तक अन्याय के खिलाफ किसान लड़ते रहेंगे? कब तक उनके अधिकारों को कुचला जाएगा?
"अगर हमारी मांगे नहीं मानी गईं, तो यह लड़ाई अब आर-पार की होगी!"—किसानों ने प्रशासन को दो टूक जवाब दे दिया है।




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