खबर का असर : बिना नंबर चल रहे टीपर पर दर्ज हुआ नंबर, चालक और सुपरवाइजर का कटा दो दिन का मजदूरी


बक्सर जिले के चौसा नगर पंचायत में बिना नंबर के चल रहे कचरा उठाने वाले वाहनों पर आखिरकार कार्रवाई हुई है। प्रशासन ने खबर सामने आने के बाद इन वाहनों पर नंबर दर्ज करा दिया है। हालांकि फिलहाल लगाए गए नंबर हाई सिक्योरिटी प्लेट नहीं हैं। नगर पंचायत की इस लापरवाही का खामियाजा अब टीपर चालक और सीनियर सुपरवाइजर को भुगतना पड़ा है। दोनों का दो दिन का मजदूरी काट लिया गया है।


नगर पंचायत में तैनात एक चालक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि गाड़ियों पर नंबर दर्ज न होने की असली जिम्मेदारी नगर पंचायत के बड़े बाबू की है। चालक ने कहा, “जब तक पैसा पास नहीं होता है, तब तक किसी भी गाड़ी की मरम्मती या नंबरिंग का काम अटक जाता है। वाहन में अगर कोई सामान टूट भी जाता है, तो उसकी शिकायत करने के बावजूद काम महीनों तक लंबित रहता है।” चालक का आरोप है कि अधिकारी स्तर की लापरवाही का ठीकरा मजदूरों और सुपरवाइजर पर फोड़ दिया गया।

ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि नगर पंचायत प्रशासन पर यह सवाल अब भी बरकरार है कि आखिर इतने दिनों तक बिना नंबर के टीपर सड़क पर कैसे दौड़ते रहे और किसी अधिकारी की नजर इस पर क्यों नहीं गई। सवाल यह भी है कि यदि मीडिया में मामला सामने न आता, तो क्या कार्रवाई होती? लोगों की मांग है कि लापरवाह अधिकारियों पर भी कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।


इस पूरे प्रकरण पर जब नगर पंचायत के बड़ा बाबू सत्य प्रकाश से पूछा गया तो उन्होंने जिम्मेदारी चालक और सुपरवाइजर पर डाल दी। उन्होंने कहा कि, “वाहनों के साथ उनके कागज जब सीनियर सुपरवाइजर को सौंपे जाते हैं, तो नंबर प्लेट लिखवाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होती है। वाहनों का हर दो माह पर सर्विस होता है। किसी गाड़ी की मरम्मती या काम कराने के बाद पैसा तुरंत नहीं मिलता, बल्कि चालक या सुपरवाइजर को उसका लिखित आवेदन देकर पास कराना होता है, जिसमें समय लगता है।”

नगर पंचायत की इस कार्यशैली से एक ओर जहां कर्मचारियों में असंतोष है, वहीं आम लोगों में भी प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल खड़े हो गए हैं। खबर का असर जरूर दिखा है, लेकिन लापरवाही की जिम्मेदारी नीचे के कर्मचारियों पर डालना कहीं न कहीं व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है।



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